लड़कियों को यह कैसे पता चलता की कोई उन्हें गलत नज़र से देख रहा है?
आंखों की एक अलग ही दुनिया होती हैं या यूं कहें कि,एक अलग किताब,जिसमें ना जानें कितने अध्याय होते हैं। कभी दिल को सुकून देने वाली नज़र,कभी अपने दर्दों को समझने वाली नज़र,तो कभी एक ऐसी नज़र,जिसे देख कर लगता है कि,हा! मेरा भी कोई अपना हैं इस भीड़ में।
जिस तरह सिक्के के दो पहलू होते हैं,ठीक उसी प्रकार,नज़र के भी कई ऐसे पहलू हैं जो हमें भयभीत करने वाली,डराने वाली या हमें मानसिक चोट पहुंचाने वाली होती हैं।
ईर्ष्या से देखी जानें वाली नज़र,एक अदृश्य नज़र के समान होती हैं लेकिन बहुत ही ज्यादा हानिकारक होती हैं, जो हमें पल पल एक अज्ञात खतरे की भांति हमारे सर पर लटकी नंगी तलवार की तरह होती हैं,जो हमें किसी भी पल नुकसान पहुंचा सकती हैं।
अब हम अपने मुख्य प्रश्न पर आतें हैं कि लड़कियों को कैसे पता चल जाता हैं कि कोई उन्हें गलत नज़र से देख रहा हैं।
तो जहां तक मुझे ज्ञात हैं,इसका कोई बायोलॉजिकल कारण तो नहीं हैं। लेकिन यह जरूर कह सकते हैं कि ये उनकी समझदारी तथा भले बुरे परिस्थितियों की एक शक्तिशाली समझ का अंश हैं जो लड़कियों को आंखों के समझने की दुनिया का सरताज बनाती हैं।
हालांकि कई बार ऐसा देखने में आया हैं कि वो बहुत जल्द धोखें की शिकार हो जाती हैं,उनसे आंखों कि नज़र देखने में चूक हो जाती हैं। और मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि ये गलती उनकी संवेदनशीलता के गुण के कारण हो जाती हैं। वे कतई नहीं चाहती कि मेरी वजह से किसी को भी चोट पहुंचें, हलकी सी भी। बस इसी चाहत में ऐसी गलतियां हो जाती हैं।
खैर! जो कुछ और भी कारण रहें हों, सच्चाई तो यही हैं। और हम इस बात से भी इंकार नहीं कर सकते कि वो आखों कि रज़ा से वाक़िफ नहीं होती हैं,बस अपनी प्रेम प्रवृति तथा सभी को खुश रखने के अद्भुत गुण के कारण कई बार,सच्चाई का ज्ञान होने के बावजूद भी,उसे अनदेखा कर देती हैं।
एक और अहम बात कि,हम सोचते हैं कि लड़कियों को कुछ पता नहीं होता हैं। ये हमारी सबसे बड़ी भूल होती हैं। आप यह मान कर चलें कि उन्हें सब कुछ तो नहीं,लेकिन बहुत कुछ पता रहता है,इसी कारण वो यह जान जाती हैं कौन उनको बुरे नज़रों से देख रहा हैं।
विज्ञान ने यह पुष्टि कि है कि लड़कियां,लड़कों की अपेक्षा,ज्यादा मजबूत( मानसिक रूप से), संयमी, दृढ़ संकल्प वान, विश्वासी होती हैं। हम यह भी देखते हैं कि कच्ची उम्र से ही लड़कियां घर को संभालने लगती हैं ( पूर्णत: नहीं पर बहुत ही अच्छे ढंग से)।वे जल्द ही सामाजिक परिस्थितियों को समझने लगती हैं।
अत: मैं यह मान कर चल रहा हूं कि,अब आप समझ सकते हैं कि लड़कियों को कैसे अच्छे बुरे नज़रों की पहचान शीघ्रता से पता चल जाती हैं।
अंतत:, आप सभी से नम्र निवेदन करता हूं कि कोई भी ऐसा काम ना करें,जिससे लड़िकयां असहज़ महसूस करें,जो उनकी प्रगति की रुकावट बनें। हमें साथ मिलकर,उनको आगे ले जाना हैं।अगर उनकी रुकावट का कारण,अगर आपकी एक बुरी नज़र भी जिम्मेवार होती हैं,तो ये आपका फ़र्ज़ बनता हैं कि आप उसे एक ऐसी नज़र में ढ़ाले जो उन्हें, प्रगति के रास्ते पर ले जाएं।
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